संविधान के अधिकार विकास की नींव हैं: सिमडेगा से राष्ट्रीय स्तर तक बहस

संविधान के अधिकार विकास की नींव हैं: सिमडेगा से राष्ट्रीय स्तर तक बहस

26 नवंबर 2025 को संविधान दिवस पर देशभर में जो बहस शुरू हुई, वो सिर्फ शपथ लेने या फ्लैग होंडे की बात नहीं थी। ये एक सवाल था: जब हमारा संविधान हर नागरिक को समानता, शिक्षा, स्वास्थ्य और न्याय का आश्वासन देता है, तो फिर सिमडेगा के आदिवासी बच्चे क्यों अभी भी बिना पेयजल के स्कूल जाते हैं? ये सवाल न सिर्फ झारखंड के जंगलों में, बल्कि बिहार के कॉलेजों और नई दिल्ली के संसद सदन में भी गूंज रहा था।

सिमडेगा: अधिकारों का दावा और वास्तविकता

सिमडेगा जिले के कुछ गांवों में आदिवासी परिवारों के बच्चे अभी भी 10 किमी चलकर स्कूल जाते हैं — जहां टीचर नहीं, बल्कि अस्थायी शिक्षक आते हैं। पेयजल के लिए उन्हें नदी के किनारे जाना पड़ता है। लेकिन जब लाइव हिंदुस्तान की रिपोर्ट में एक गांव की महिला ने कहा, "हमारे पास अधिकार हैं, बस उनकी जानकारी नहीं है" — तो ये सवाल अब बस आंकड़ों का नहीं, बल्कि इंसानी दर्द का बन गया।

संविधान के अनुच्छेद 243 में आदिवासी जमीन के अधिकारों का उल्लेख है, और वनाधिकार अधिनियम, 2006 के तहत उन्हें जंगल के संसाधनों का नियंत्रण दिया गया। लेकिन जब एक वन अधिकारी ने एक ग्रामीण को बताया, "आपका अधिकार है, लेकिन दस्तावेज़ नहीं हैं" — तो ये अधिकार कागज़ पर रुक गए। विशेषज्ञों का कहना है कि इस तरह के अधिकारों का क्रियान्वयन तभी संभव है जब स्थानीय प्रशासन, जनप्रतिनिधि और आदिवासी समुदाय एक साथ बैठें।

बीएनएम कॉलेज: शिक्षा का अधिकार, जागृति का आह्वान

बिहार के लखीसराय के बीएनएम कॉलेज बड़हिया में 26 नवंबर को आयोजित विचार गोष्ठी में डॉ. पूनम कुमारी ने एक सीधी बात कही: "जब तक छात्रों में ये बोध नहीं होगा कि उनके अधिकार के साथ कर्तव्य भी जुड़ा है, तब तक विकास बस एक शब्द बना रहेगा।"

उनके बाद राजनीति विज्ञान विभागाध्यक्ष डॉ. आनंदी कुमार ने महिलाओं के अधिकारों पर बात की। उन्होंने बताया कि संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 16 में महिलाओं के लिए समानता की गारंटी है, लेकिन बिहार में अभी भी 67% ग्रामीण महिलाएं अपने नाम पर जमीन का दस्तावेज़ नहीं रखतीं। "ये अधिकार कानून में हैं, लेकिन घरों में नहीं," उन्होंने कहा।

राष्ट्रीय स्तर पर: कर्तव्य का दबाव

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संविधान दिवस पर अपने संदेश में कहा, "अधिकार, कर्तव्यों के पालन से उत्पन्न होते हैं।" ये बयान सिर्फ एक नीति नहीं, बल्कि एक नया नैतिक ढांचा था। उन्होंने महात्मा गांधी के विचार को याद किया — जो कभी नहीं कहते थे, "मुझे अधिकार दो" — बल्कि कहते थे, "मैं अपना कर्तव्य निभाऊंगा।"

उपराष्ट्रपति ने अपने भाषण में एक आंकड़ा दिया: भारत अब दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। और जल्द ही तीसरे स्थान पर पहुंच जाएगा। लेकिन उन्होंने तुरंत जोड़ा: "इस उपलब्धि के पीछे वो लाखों महिलाएं हैं जिन्होंने आधार कार्ड बनवाया, जेएएम ऐप डाउनलोड किया, और डीबीटी के जरिए अपना लाभ पाया।" ये वह अधिकार-आधारित विकास था — जहां बेहतर शिक्षा और स्वास्थ्य नहीं, बल्कि सरकारी सुविधाओं की पहुंच ने जीवन बदला।

अधिकार-आधारित विकास: एक नया रास्ता

28 जुलाई 2025 को टाइम्स ऑफ इंडिया ब्लॉग में मोहम्मद नवाजुद्दीन, सबा कोहली और डेव ने एक गहरा विश्लेषण प्रकाशित किया। उन्होंने कहा: "जब हम विकास को बस GDP बढ़ाने के रूप में देखते हैं, तो हम गरीबों के अधिकारों को तोड़ देते हैं।" उन्होंने उदाहरण दिया — जब कोई बड़ा प्रोजेक्ट आदिवासी जमीन पर लगता है, तो उन्हें बेहतर रोजगार का वादा किया जाता है, लेकिन वो रोजगार अक्सर अस्थायी और न्यूनतम वेतन पर होता है।

अधिकार-आधारित विकास का मतलब है — विकास ऐसा हो जो न्याय को नुकसान न पहुंचाए। ये बस नियम नहीं, बल्कि एक नैतिक दायित्व है।

क्या आगे है?

अब सवाल ये है: क्या सिमडेगा के गांवों में आदिवासी समुदाय अपने अधिकारों के बारे में जागरूक हो पाएंगे? क्या बीएनएम कॉलेज के छात्र इस बात को अपने जीवन में उतार पाएंगे? और क्या सरकारें अपने योजनाओं को अधिकारों के आधार पर फिर से डिज़ाइन करेंगी — न कि केवल बजट के आधार पर?

एक बात साफ है: संविधान के अधिकार अब बस कागज़ पर नहीं रह सकते। वो जीवन का हिस्सा बनने चाहिए — एक बच्चे के शिक्षा के लिए चलने के रास्ते में, एक महिला के जमीन के दस्तावेज़ में, एक ग्रामीण के बैंक खाते में।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

संविधान में आदिवासी अधिकार क्या हैं और उनका क्रियान्वयन क्यों नहीं हो रहा?

संविधान के अनुच्छेद 243 और वनाधिकार अधिनियम, 2006 के तहत आदिवासी समुदायों को जंगल के संसाधनों, जमीन और सांस्कृतिक अधिकार दिए गए हैं। लेकिन क्रियान्वयन नहीं हो पा रहा क्योंकि जानकारी तक पहुंच नहीं है, दस्तावेज़ नहीं हैं, और स्थानीय प्रशासन में जिम्मेदारी का अभाव है। अधिकारों को कानून से नहीं, बल्कि जागरूकता और भागीदारी से जीवन में लाया जा सकता है।

प्रधानमंत्री मोदी का 'कर्तव्य पहल' का मतलब क्या है?

इसका मतलब है कि अधिकारों का दावा करने से पहले, हमें अपने कर्तव्यों का पालन करना चाहिए — जैसे कि शिक्षा के लिए बच्चों को भेजना, स्वच्छता का ध्यान रखना, या नागरिक अधिकारों के लिए आवाज उठाना। ये एक नैतिक रणनीति है: जब नागरिक जिम्मेदार बनते हैं, तो राज्य उनके अधिकारों की रक्षा करने के लिए ज़िम्मेदार बनता है।

महिलाओं के अधिकारों का संविधान में क्या स्थान है और वास्तविकता क्या है?

संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 16 में महिलाओं के लिए समानता, अपमान से सुरक्षा और रोजगार में समान अवसर की गारंटी है। लेकिन बिहार और झारखंड जैसे राज्यों में 60-70% ग्रामीण महिलाओं के पास अपने नाम पर जमीन का दस्तावेज़ नहीं है। ये एक बड़ा अंतर है — कानूनी अधिकार और वास्तविक नियंत्रण के बीच।

जेएएम और डीबीटी कैसे अधिकार-आधारित विकास का उदाहरण हैं?

जेएएम (जन-धन, आधार, मोबाइल) और डीबीटी (प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण) ने गरीबों को सीधे लाभ पहुंचाया — बिना बीच में किसी दलाल के। ये एक अधिकार है: न्याय का अधिकार। इससे लाखों महिलाओं को बैंक खाता मिला, जिससे उन्हें अपनी आय पर नियंत्रण मिला। ये विकास नहीं, बल्कि अधिकारों का विस्तार है।

क्या अधिकार-आधारित विकास केवल गरीबों के लिए है?

नहीं। ये विकास का एक नैतिक ढांचा है जो हर नागरिक के लिए है — चाहे वह एक शहरी नौकरशाह हो या ग्रामीण महिला। ये बताता है कि विकास कोई व्यापार नहीं, बल्कि एक न्याय का विषय है। जब कोई निर्माण परियोजना आदिवासी जमीन पर बनती है, तो उसका लाभ उन्हें भी मिलना चाहिए — न कि उन्हें बेवजह बेदखल किया जाए।

द्वारा लिखित राजीव अधिगम

मेरा नाम राजीव अधिगम है और मैं समाचार और राजनीतिक विशेषज्ञ हूं। मैं भारतीय जीवन के बारे में लेखन पसंद करता हूं। समाचार और राजनीति के अलावा, मैं भारत की विभिन्न सांस्कृतिक और सामाजिक मुद्दों पर गहराई से अध्ययन करता हूं। लोकतांत्रिक विचारधारा के समर्थन में, मैं एक निष्पक्ष, सचेत और गहन लेखक हूं। मेरा लक्ष्य हमारी समाज में जागरूकता फैलाने के साथ-साथ विचारधारा के विकास में योगदान करना है।

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